Adhyāya 112: Ṛṣyaśṛṅga’s Description of an Exemplary Brahmacārī
Ascetic Presence and Vow-Practice
तोयानि चैवातिरसानि महां प्रादात् स वै पातुमुदाररूप: । पीत्वैव यान्यभ्यधिकः: प्रहर्षो ममाभवद् भूश्वलितेव चासीत्,उदारताके मूर्तिमान् स्वरूप उस ब्रह्मचारीने मुझे पीनेके लिये अत्यन्त स्वादिष्ट जल भी दिया था। उस जलको पीते ही मेरे हर्षकी सीमा न रही। मुझे यह धरती डोलती-सी जान पड़ने लगी
toyāni caivātirasāni mahān prādāt sa vai pātum udārarūpaḥ | pītvaiva yāny abhyadhikaḥ praharṣo mamābhavad bhūś caliteva cāsīt ||
उस उदार-रूप ब्रह्मचारी ने मुझे पीने के लिए अत्यन्त मधुर स्वाद वाले जल की प्रचुर मात्रा दी। उसे पीते ही मेरे भीतर अपार, असीम हर्ष उमड़ पड़ा; और पृथ्वी भी मानो मेरे आनंद की मूर्ति बनकर डोलने लगी।
ऋष्यशुड्र उवाच