Hemakūṭa’s Marvels and Lomaśa’s Account of Ṛṣabha at Ṛṣabhakūṭa
Nandā–Kauśikī Tīrtha Passage
फेनपुञज्जाकुलजला हंसानामिव पडुक्तय: । क्वचिदाभोगकुटिला प्रस्खलन्ती क्वचित् क्वचित्,महाराज! नीचे गिरती हुई फेनपुञ्जसे व्याप्त हुए जलवाली समुद्रगामिनी गंगा तीन धाराओंमें बँटकर हंसोंकी पंक्तियोंके समान सुशोभित होने लगी। वह मतवाली स्त्रीकी भाँति इस प्रकार आयी कि कहीं तो सर्प-शरीरकी भाँति कुटिल गतिसे बहती थी और कहीं-कहीं ऊँचेसे नीचे गिरकर चट्टानोंसे टकराती जाती थी एवं श्वेत वस्त्रोंके समान प्रतीत होनेवाले फेनपुंज उसे आच्छादित किये हुए थे। कहीं-कहीं वह जलके कल-कल नादसे उत्तम संगीत-सा गा रही थी। इस प्रकार अनेक रूप धारण करनेवाली गंगा आकाशसे गिरी और भूतलपर पहुँचकर राजा भगीरथसे बोली---
phenapuñjākulajalā haṃsānām iva paṅktayaḥ | kvacid ābhogakuṭilā praskhalantī kvacit kvacit ||
लोमश बोले—महाराज! समुद्र की ओर वेग से बढ़ती गंगा का जल फेनपुञ्जों से भर गया था। वह तीन धाराओं में बँटकर हंसों की पंक्तियों-सी शोभित हुई। मतवाली स्त्री की भाँति वह नाना प्रकार से चली—कहीं सर्प-सी विस्तृत वक्रता लेकर बहती, कहीं ऊँचाई से गिरती हुई शिलाओं से टकराती; और श्वेत वस्त्रों-से प्रतीत होने वाले फेनसमूह उसे ढँके रहते। कहीं उसके जल का कल-कल नाद उत्तम संगीत-सा जान पड़ता। इस प्रकार अनेक रूप धारण कर गगन से उतरी गंगा पृथ्वी पर पहुँचकर राजा भगीरथ से बोली।
लोगश उवाच