हिरण्यपुरवर्णनम्
Description of Hiraṇyapura and the Nivātakavacas
अत्रासुरोडग्नि: सततं दीप्यते वारिभोजन: । व्यापारेण धृतात्मानं निबद्धं समबुध्यत,यहाँ जलका ही आहार करनेवाली आसुर अग्नि सदा उद्दीप्त रहती है। उसे यत्नपूर्वक मर्यादामें स्थापित किया गया है। वह अग्नि अपने-आपको देवताओं-द्वारा नियन्त्रित समझती है; इसलिये सब ओर फैल नहीं पाती
यहाँ जल को ही आहार करने वाली आसुरी अग्नि सदा प्रज्वलित रहती है। उसे यत्नपूर्वक मर्यादा में बाँधकर रखा गया है; वह अपने को देवताओं द्वारा नियंत्रित समझती है, इसलिए चारों ओर फैल नहीं पाती।
नारद उवाच