कण्वोपदेशः—नश्वरबलविवेकः तथा मातलिगुणकेश्याः आख्यानारम्भः
Kaṇva’s Counsel on Impermanent Power; Opening of the Mātali–Guṇakeśī Narrative
नहास्मिन्नाश्रमे युद्ध कुत: शस्त्र कुतो5नृजुः । अन्यत्र युद्धमाकाड्क्ष बहव: क्षत्रिया: क्षितौ,नर-नारायण बोले--नृपश्रेष्ठ] हमारा यह आश्रम क्रोध और लोभसे रहित है। इस आश्रममें कभी युद्ध नहीं होता, फिर अस्त्र-शस्त्र और कुटिल मनोवृत्तिका मनुष्य यहाँ कैसे रह सकता है? इस पृथ्वीपर बहुत-से क्षत्रिय हैं, अतः आप कहीं और जाकर युद्धकी अभिलाषा पूर्ण कीजिये
na hāsminnāśrame yuddhaṁ kutaḥ śastraṁ kuto 'nṛjuḥ | anyatra yuddham ākāṅkṣa bahavaḥ kṣatriyāḥ kṣitau ||
इस आश्रम में युद्ध नहीं है—तो फिर यहाँ शस्त्र कहाँ, और कुटिलता कहाँ? यदि युद्ध की इच्छा है तो अन्यत्र जाइए; इस पृथ्वी पर बहुत-से क्षत्रिय हैं, जिनसे आपकी युद्ध-इच्छा पूरी हो सकती है।
वैशम्पायन उवाच