विदुरस्य कृष्णं प्रति शमोपदेशः
Vidura’s Counsel to Krishna on the Limits of Peace
उभयोश्वाददा: साहामुभयोश्व हिते रत:,आपने तो दोनों पक्षोंको ही सहायता दी है, आप उभयपक्षके हित-साधनमें तत्पर हैं। माधव! महाराज धूृतराष्ट्रके आप प्रिय सम्बन्धी भी हैं। चक्र और गदा धारण करनेवाले गोविन्द! आपको धर्म और अर्थका सम्पूर्णरूपसे यथार्थ ज्ञान भी है; फिर मेरा आतिथ्य ग्रहण न करनेका क्या कारण है; यह मैं सुनना चाहता हूँ
ubhayor dadāḥ sahāyam ubhayor hitе rataḥ | āpanne tau dvau pakṣau hi sahāyyaṁ te kṛtaṁ vibho || mādhava dhṛtarāṣṭrasya priyaḥ sambandhī cāsi vai | cakra-gadā-dhara govinda dharmārthau te yathārthataḥ || atha me ’tithyam ādatte na kathaṁ hetur atra te | etad icchāmi śrotuṁ vai ||
वैशम्पायन बोले—आपने दोनों पक्षों को सहायता दी है और दोनों के हित में तत्पर रहे हैं। माधव! आप महाराज धृतराष्ट्र के प्रिय सम्बन्धी भी हैं। चक्र-गदा धारण करने वाले गोविन्द! आपको धर्म और अर्थ का यथार्थ, पूर्ण ज्ञान है; फिर आप मेरा आतिथ्य क्यों नहीं स्वीकार करते? इसका कारण मैं सुनना चाहता हूँ।
वैशम्पायन उवाच