Kṛṣṇa at Duryodhana’s House: Refusal of Hospitality and Departure to Vidura (कृष्णस्य धार्तराष्ट्रनिवेशनगमनम्)
पक्ष्मसम्पातजे काले नकुलेन विनाकृता । न लभामि धृतिं वीर साद्य जीवामि पश्य माम्
वीर! पलक झपकने जितने समय के लिए भी नकुल से बिछुड़ती थी तो धैर्य नहीं रहता था; और अब इतने दिनों से उसे न देखकर भी जी रही हूँ—देखो, मैं कितनी कठोर हो गई हूँ।
वैशम्पायन उवाच