उद्योगपर्व — विदुरोक्तिः
Dhṛtarāṣṭra Addressed on Sincerity, Hospitality, and Settlement
दासीनामप्रजातानां शुभानां रुक्मवर्चसाम् | शतमस्मै प्रदास्यामि दासानामपि तावताम्,साथ ही मैं उन्हें सुवर्णकी-सी कान्तिवाली परम सुन्दरी सौ ऐसी दासियाँ दूँगा, जिनसे किसी संतानकी उत्पत्ति नहीं हुई है। दासियोंके ही बराबर दास भी दूँगा
dāsīnām aprajātānāṁ śubhānāṁ rukmavarcasām | śatam asmai pradāsyāmi dāsānām api tāvatām ||
मैं उन्हें सुवर्ण-सी कान्तिवाली, परम शुभ और अत्यन्त सुन्दरी, जिनसे अभी तक संतान उत्पन्न नहीं हुई है—ऐसी सौ दासियाँ दूँगा; और उतने ही दास भी दूँगा।
धृतराष्ट उवाच