अध्याय ८२ — केशवप्रयाणे निमित्तदर्शनम्
Omens and Reception During Keśava’s Departure
प्रत्रजन्तोडनुधावन्तीं कृपणां पुत्रगृद्धिनीम् । रुदतीमपहायैनामगच्छाम वयं वनम्,जब हम वनको जा रहे थे, उस समय पुत्रस्नेहसे व्याकुल हो वह कातरभावसे रोती हुई हमारे पीछे-पीछे दौड़ी आ रही थी, परंतु हमलोग उसे वहीं छोड़कर वनमें चले गये
pratrajantod anudhāvantīṁ kṛpaṇāṁ putragṛddhinīm | rudatīm apahāyainām agacchāma vayaṁ vanam ||
जब हम वन को जा रहे थे, तब पुत्र-स्नेह से व्याकुल वह दीन-सी, कातर होकर रोती हुई हमारे पीछे-पीछे दौड़ी आती थी; पर हम उसे वहीं छोड़कर वन में चले गए।
युधिष्ठिर उवाच