अध्याय ७५ — दैव-पुरुषकार-समन्वयः
Reconciling Contingency and Human Effort
सर्वलोकादभिक्रुद्धान्न भयं विद्यते मम । कि तु सौहृदमेवैतत् कृपया मधुसूदन । सर्वास्तितिक्षे संक्लेशान् मा सम नो भरता नशन्,मेरी मज्जा शिथिल नहीं हो रही है और न मेरा हृदय ही काँप रहा है। मधुसूदन! यदि समस्त संसार अत्यन्त कुपित होकर मुझपर आक्रमण करे, तो भी उससे मुझे भय नहीं है; किंतु मैंने जो शान्तिका प्रस्ताव किया है, यह तो केवल मेरा सौहार्द ही है। मैं दयावश सारे क्लेश सह लेनेको तैयार हूँ और चाहता हूँ कि हमारे कारण भरतवंशियोंका नाश न हो
मधुसूदन! यदि समस्त लोक अत्यन्त कुपित होकर मुझ पर चढ़ आएँ, तो भी मुझे भय नहीं है। पर यह जो मैंने शान्ति का प्रस्ताव रखा है, वह तो केवल सौहार्दवश है। दयावश मैं सब क्लेश सह लेने को तैयार हूँ; बस यह चाहता हूँ कि हमारे कारण भरतवंशियों का नाश न हो।
भीमसेन उवाच