भीमसेनस्य आत्मबलप्रशंसा — Bhīmasena’s Assertion of Strength
Udyoga Parva, Adhyāya 74
अकस्मात् स्मयमानश्न रहस्यास्से रुदन्निव | जान्वोर्मूर्धानमाधाय चिरमास्से प्रमीलित:,कभी सहसा हँस पड़ते और कभी एकान्त स्थानमें रोते हुए-से प्रतीत होते थे और कभी घुटनोंपर मस्तक रखकर दीर्घकालतक नेत्र बंद किये बैठे रहते थे
akasmāt smayamānaś ca rahasy āsse rudann iva | jānvor mūrdhānam ādhāya ciram āsse pramīlitaḥ ||
कभी तुम सहसा हँस पड़ते, कभी एकान्त में रोते हुए-से प्रतीत होते; और कभी घुटनों पर मस्तक रखकर, नेत्र मूँदे, दीर्घकाल तक बैठे रहते थे।
वैशम्पायन उवाच