Adhyaya 60: Self-Assertion, Daiva, and the Rhetoric of Inevitability (उद्योग पर्व)
अश्मवर्ष च वायुं च शमयामीह नित्यश: । जगत: पश्यतो5भीक्ष्णं भूतानामनुकम्पया
शिलावृष्टि और आँधी को भी मैं सदा, समस्त प्राणियों पर अनुकम्पा करके, जगत् के देखते-देखते बार-बार यहीं शान्त कर देता हूँ।
वैशम्पायन उवाच