Adhyaya 60: Self-Assertion, Daiva, and the Rhetoric of Inevitability (उद्योग पर्व)
विदीर्यमाणां वसुधां गिरीणां शिखराणि च । लोकस्य पश्यतो राजन् स्थापयाम्यभिमन्त्रणात्
हे राजन्! सब लोगों के देखते-देखते विदीर्ण होती हुई पृथ्वी और टूटकर गिरते हुए पर्वत-शिखरों को भी मैं मन्त्रबल से अभिमन्त्रित करके पूर्ववत् स्थापित कर सकता हूँ।
वैशम्पायन उवाच