धृतराष्ट्रस्य बलाबलचिन्ता
Dhṛtarāṣṭra’s Appraisal of Strength and Preference for Śama
वानरश्न ध्वजो दिव्यो नि:सड़ो धूमवद्गति: । रथश्न चतुरन्तायां यस्य नास्ति सम: क्षितौ
जिसका दिव्य वानरध्वज कहीं अटकता नहीं, धूम के समान वेग से निर्बाध चलता है; और जिसका रथ चारों दिशाओं में पृथ्वी पर समकक्ष नहीं रखता।
वैशम्पायन उवाच