Saṃjaya’s Warning to Dhṛtarāṣṭra: Accountability, Alliance-Shift, and the Pāṇḍava Strategic Edge
भक््त्या हास्य विरुध्यन्ते तव पुत्र: सदैव ते । अनहनिव तु वधे धर्मयुक्तान् विकर्मणा,युधिष्ठिरके प्रति भक्ति रखनेके कारण वे सब सदा ही आपके पुत्रोंके साथ विरोध रखते हैं। महाराज! जो सदा धर्ममें तत्पर रहनेके कारण वध (और क्लेश पाने)-के कदापि योग्य नहीं थे, उन पाण्डुपुत्रोंकी जिसने सदा विपरीत बर्तावसे कष्ट पहुँचाया है और जो इस समय भी उनके प्रति द्वेषभाव ही रखता है, आपके उस पापी पुत्र दुर्योधनको ही सभी उपायोंसे साथियोंसहित काबूमें रखना चाहिये। आप बारंबार इस तरह शोक न करेें। द्यूतक्रीड़ाके समय मैंने तथा परम बुद्धिमान् विदुरजीने भी आपको यही सलाह दी थी, (परंतु आपने ध्यान नहीं दिया)
bhaktyā hāsya virudhyante tava putrāḥ sadaiva te | anahaniva tu vadhe dharmayuktān vikarmaṇā |
संजय बोले—धर्म और युधिष्ठिर के प्रति भक्ति के कारण वे सदा तुम्हारे पुत्रों के विरोध में रहते हैं। जो पाण्डव धर्मनिष्ठ हैं और वध के योग्य नहीं थे, उन्हें अधर्मपूर्ण आचरण से कष्ट दिया गया है। इसलिए तुम्हारा पापी पुत्र दुर्योधन—जो निरन्तर उलटे व्यवहार से उन्हें सताता रहा है और आज भी उनसे द्वेष रखता है—अपने साथियों सहित हर उपाय से वश में किया जाना चाहिए। तुम बार-बार इस प्रकार शोक मत करो। द्यूत-क्रीड़ा के समय मैंने और परम बुद्धिमान् विदुर ने भी तुम्हें यही सलाह दी थी, पर तुमने नहीं मानी।
संजय उवाच
A ruler must restrain a wayward, hateful heir even if he is one’s own son; devotion to dharma naturally creates opposition to adharma, and ignoring wise counsel (especially after the dice-game) leads to escalating harm and inevitable conflict.
Sañjaya addresses Dhṛtarāṣṭra, explaining that the Pāṇḍavas oppose the Kauravas out of devotion to dharma and loyalty to Yudhiṣṭhira. He urges Dhṛtarāṣṭra to control Duryodhana and his faction, reminding him that the same warning was given earlier by Sañjaya and Vidura during the dice-game episode.