अर्जुन-माहात्म्य-चिन्ता
Dhṛtarāṣṭra’s Appraisal of Arjuna’s Strategic Supremacy
यथा कक्ष महानग्नि: प्रदहेत् सर्वतश्नरन् । हि 5. 2:08 धक्ष्यति मामकान्
yathā kakṣaḥ mahāgniḥ pradahyeta sarvataś caran | tathā dhakṣyati māmākān arjunaḥ ||
धृतराष्ट्र बोले—जैसे जंगल की प्रचण्ड आग चारों ओर फैलकर सूखी घास और झाड़ियों को जला कर भस्म कर देती है, वैसे ही अर्जुन मेरे पुत्रों को दग्ध कर राख कर देगा।
धृतराष्ट उवाच