अर्जुन-माहात्म्य-चिन्ता
Dhṛtarāṣṭra’s Appraisal of Arjuna’s Strategic Supremacy
जिगाय च सुरान् सर्वान् नास्य विद्य: पराजयम् । खाण्डवदाहके समय अर्जुनने (मुख्य-मुख्य) तैंतीस- देवताओंको युद्धके लिये ललकारकर अग्नि-देवको तृप्त किया और सभी देवताओंको जीत लिया। उनकी कभी पराजय हुई हो, इसका पता हमें आजतक नहीं लगा || १० है ।।
jigāya ca surān sarvān nāsya vidyate parājayam | khaṇḍavadāhake samaye arjunena (mukhya-mukhya) trayastriṃśad-devatāḥ yuddhāya lalakāritāḥ agni-devaś ca tṛptaḥ kṛtaḥ, sarvāś ca devatāḥ jitāḥ | tasya kadācit parājayo bhūta iti na vayaṃ adyāpi jānīma || yasya yantā hṛṣīkeśaḥ śīla-vṛtta-samaḥ yudhi ||
धृतराष्ट्र बोले—उसने समस्त देवताओं को जीत लिया; उसकी पराजय का कहीं पता नहीं। खाण्डव-दाह के समय उसने तैंतीस देवताओं में जो प्रमुख थे, उन्हें युद्ध के लिए ललकारकर अग्निदेव को तृप्त किया और सब देवताओं पर विजय पाई। आज तक हमने उसकी हार का कोई प्रसंग नहीं सुना। और जिसके रथ का सारथि स्वयं हृषीकेश हों—जो युद्ध में शील और वृत्त में अडिग हो—उसके पक्ष को कौन डिगा सकता है?
धृतराष्ट उवाच