एतौ हि कर्मणा लोकानश्रुवातेक्षयान् ध्रुवान् | तत्र तत्रैव जायेते युद्धकाले पुन: पुन:,ये दोनों अपने सत्कर्मके प्रभावसे अक्षय एवं ध्रुवलोकोंको व्याप्त करके स्थित हैं। लोकहितके लिये जब-जब जहाँ-जहाँ युद्धका अवसर आता है, तब-तब वहाँ-वहाँ ये बार- बार अवतार ग्रहण करते हैं
ये दोनों अपने कर्मबल से अक्षय और ध्रुव लोकों में स्थित हैं। लोकहित के लिए जब-जब जहाँ-जहाँ युद्ध का समय आता है, तब-तब वहाँ-वहाँ ये बार-बार प्रकट होते हैं।
वैशम्पायन उवाच