Udyoga-parva Adhyāya 47 — Arjuna’s Deterrent Declaration
Sañjaya’s Report
कान्दिग्भूतं छिन्नगात्र विसंज्ञं दुर्योधनो द्रक्ष्यति सर्वसैन्यम् । हताश्चवीराग्रयनरेन्द्रनागं पिपासिते श्रान्तपत्रं भयारत॑म्,“दुर्योधन अपनी आँखों यह देखेगा कि उसकी सारी सेना (भयसे भागने लगी है और उस)-को यह भी नहीं सूझता है कि किस दिशाकी ओर जाऊँ? कितने ही योद्धाओंके अंग- प्रत्यंग छिन्न-भिन्न हो गये हैं। समस्त सैनिक अचेत हो रहे हैं। हाथी, घोड़े तथा वीराग्रगण्य नरेश मार डाले गये हैं। सारे वाहन थक गये हैं और सभी योद्धा प्यास तथा भयसे पीड़ित हो रहे हैं। बहुतेरे सैनिक आर्त स्वरसे रो रहे हैं, कितने ही मारे गये और मारे जा रहे हैं। बहुतोंके केश, अस्थि तथा कपालसमूह सब ओर बिखरे पड़े हैं। मानो विधाताका यथार्थ निश्चित विधान हो, इस प्रकार यह सब कुछ होकर ही रहेगा। यह सब देखकर उस समय मन्दबुद्धि दुर्योधनके मनमें बड़ा पश्चात्ताप होगा
sañjaya uvāca |
kāndigbhūtaṃ chinnagātraṃ visaṃjñaṃ duryodhano drakṣyati sarvasainyam |
hatāś ca vīrāgrya-narendra-nāgaṃ pipāsite śrānta-patraṃ bhayārtaṃ ||
संजय बोले—दुर्योधन अपनी समूची सेना को दिशाहीन, व्याकुल और भग्न देखेगा—अंग-प्रत्यंग कटे हुए, बहुत-से योद्धा अचेत होकर गिरे पड़े। वह अग्रणी वीरों को और राजहाथियों को मरा हुआ देखेगा; स्वयं हाथी प्यास से व्याकुल, पत्तों के पंख थककर झुके हुए, भय से पीड़ित होंगे। अधर्ममय निश्चय से उपजे इस विनाश को सामने पाकर, धर्म छोड़कर युद्ध चुनने का नैतिक फल उसे भोगना ही पड़ेगा।
संजय उवाच
The verse underscores the ethical law of consequence: a war pursued through pride and adharma culminates in terror, disorder, and irreversible loss, forcing even the instigator to confront the fruits of his choices.
Sañjaya vividly foretells what Duryodhana will see on the battlefield: the Kaurava forces in chaos, warriors mutilated or unconscious, leading heroes and war-elephants slain, and the survivors exhausted, thirsty, and overwhelmed by fear.