अध्याय ४६ — सभाप्रवेशः तथा सञ्जयस्य दूतवृत्तान्तः
Entry into the Royal Assembly and Sañjaya’s Envoy Report
यथाहं धृतराष्ट्रेण शिष्ट: पूर्वमितो गतः । अब्र॒ुवं पाण्डवान् गत्वा तन्निबोधत पार्थिवा:,(अब्रूतां तत्र धर्मेण वासुदेवधनंजयौ ।) पहले यहाँसे जाते समय महाराज धूृतराष्ट्रने मुझे जैसा उपदेश दिया था, पाण्डवोंके पास जाकर मैंने वैसी ही बातें कही हैं। राजाओ! अब भगवान् श्रीकृष्ण और अर्जुनने जो धर्मके अनुकूल उत्तर दिया है, उसे आपलोग ध्यान देकर सुनें
sañjaya uvāca | yathāhaṁ dhṛtarāṣṭreṇa śiṣṭaḥ pūrvam ito gataḥ | abruvaṁ pāṇḍavān gatvā tannibodhata pārthivāḥ | (abrūtāṁ tatra dharmeṇa vāsudeva-dhanañjayau) |
संजय ने कहा—जैसे महाराज धृतराष्ट्र ने पहले यहाँ से जाते समय मुझे उपदेश दिया था, वैसी ही बात मैंने पाण्डवों के पास जाकर कही। हे राजाओ, अब वहाँ भगवान वासुदेव (श्रीकृष्ण) और धनंजय (अर्जुन) ने धर्म के अनुसार जो उत्तर दिया है, उसे आप सब ध्यान देकर सुनें।
संजय उवाच