Sanatsujāta on the Imperceptible Eternal Light (यत्तच्छुक्रं महज्ज्योतिः)
हिरण्यपर्णम श्वत्थमभिपद्य हापक्षका: । ते तत्र पक्षिणो भूत्वा प्रपतन्ति यथा दिशम् | योगिनस्तं प्रपश्यन्ति भगवन्तं सनातनम्,जिसके विषयरूपी पत्ते स्वर्णके समान मनोरम दिखायी पड़ते हैं, उस संसाररूपी अश्वत्थवृक्षपर आरूढ़ होकर पंखहीन जीव कर्मरूपी पंख धारणकर अपनी वासनाके अनुसार विभिन्न योनियोंमें पड़ते हैं अर्थात् एक योनिसे दूसरी योनिमें गमन करते हैं; किंतु योगीजन उस सनातन परमात्माका साक्षात्कार करते हैं
sanatsujāta uvāca |
hiraṇyaparṇam aśvattham abhipadya hy apakṣakāḥ |
te tatra pakṣiṇo bhūtvā prapatanti yathā diśam |
yoginas taṁ prapaśyanti bhagavantaṁ sanātanam ||
विषयरूपी स्वर्ण-सदृश पत्तों वाले संसाररूपी अश्वत्थ पर आरूढ़ होकर, जो जीव स्वभावतः पंखहीन हैं, वे कर्मरूपी पंख धारण कर अपनी वासनाओं से प्रेरित होकर जिस-जिस दिशा में गिरते-उड़ते हैं—एक योनि से दूसरी योनि में जाते हैं। पर योगीजन उस सनातन भगवान् का यथार्थ साक्षात्कार करते हैं।
सनत्सुजात उवाच