Sanatsujāta on the Imperceptible Eternal Light (यत्तच्छुक्रं महज्ज्योतिः)
जैसे सब ओर जलसे परिपूर्ण बड़े जलाशयके प्राप्त होनेपर जलके लिये अन्यत्र जानेकी आवश्यकता नहीं होती, उसी प्रकार आत्मज्ञानीके लिये सम्पूर्ण वेदोंमें कुछ भी प्राप्त करनेयोग्य शेष नहीं रह जाता ।। अड्गुष्ठमात्र: पुरुषो महात्मा न दृश्यते सौहृदि संनिविष्ट: । अजक्षरो दिवारात्रमतन्।द्रितश्न सतं मत्वा कविरास्ते प्रसन्न:,यह अंगुष्ठमात्र अन्तर्यामी परमात्मा सबके हृदयके भीतर स्थित है, किंतु सबको दिखायी नहीं देता। वह अजन्मा, चराचरस्वरूप और दिन-रात सावधान रहनेवाला है। जो उसे जान लेता है, वह ज्ञानी परमानन्दमें निमग्न हो जाता है
yathā sarvataḥ jalena paripūrṇe mahati jalāśaye prāpte jalārtham anyatra gantum na āvaśyakam, tathā ātmajñāninaḥ sarveṣu vedeṣu kiñcid api prāptavyaṁ śeṣaṁ na tiṣṭhati. aṅguṣṭhamātraḥ puruṣo mahātmā na dṛśyate sauhṛdi sanniviṣṭaḥ; ajaḥ akṣaraḥ divārātram atandritaḥ—taṁ santaṁ matvā kaviḥ āste prasannaḥ.
जैसे सब ओर जल से परिपूर्ण महान् जलाशय के प्राप्त होने पर जल के लिए अन्यत्र जाने की आवश्यकता नहीं होती, वैसे ही आत्मज्ञानी के लिए समस्त वेदों में कुछ भी प्राप्त करने योग्य शेष नहीं रह जाता। यह अंगुष्ठमात्र अन्तर्यामी महात्मा पुरुष सबके हृदय में स्थित है, पर सबको दिखाई नहीं देता। वह अजन्मा, अक्षय और दिन-रात अतन्द्रित है; उसे सत्य मानकर जो जान लेता है, वह कवि-ज्ञानी प्रसन्न होकर परमानन्द में स्थित रहता है।
सनत्सुजात उवाच