Sanatsujāta–Dhṛtarāṣṭra Saṃvāda: Brahmacarya and the Formless Brahman
Udyoga Parva 44
द्वादशैते महादोषा मनुष्यप्राणनाशना: । सनत्सुजातजी कहते हैं--राजन्! शोक, क्रोध, लोभ, काम, मान, अत्यन्त निद्रा, ईर्ष्या, मोह, तृष्णा, कायरता, गुणोंमें दोष देखना और निन्दा करना--ये बारह महान् दोष मनुष्योंके प्राणनाशक हैं,यतो यज्ञा: प्रवर्धन्ते सत्यस्यैवावरो धनात् । मनसान्यस्य भवति वाचान्यस्याथ कर्मणा क्योंकि सत्यस्वरूप ब्रह्मका बोध न होनेसे ही इन सकाम यज्ञोंकी वृद्धि होती है। किसीका यज्ञ मनसे, किसीका वाणीसे और किसीका क्रियाके द्वारा सम्पन्न होता है
dvādaśaite mahādoṣā manuṣyaprāṇanāśanāḥ | yato yajñāḥ pravardhante satyasyaivāvaro dhanāt | manasānyasya bhavati vācānyasyātha karmaṇā ||
सनत्सुजात बोले—राजन्! ये बारह महादोष मनुष्यों के प्राणनाशक हैं: शोक, क्रोध, लोभ, काम, मान, अत्यधिक निद्रा, ईर्ष्या, मोह, तृष्णा, कायरता, गुणों में दोष देखना और निंदा। सत्यस्वरूप ब्रह्म का बोध न होने से ही सकाम यज्ञ बढ़ते हैं; किसी का यज्ञ मन से होता है, किसी का वाणी से और किसी का कर्म (शरीर) से।
सनत्युजात उवाच