Sanatsujāta on Vedic Learning, Truth (Satya), and the Discipline of Dama–Tyāga–Apramāda
य आश्रयेत् पावयेच्चापि राजन् सर्व शरीरं तपसा तप्यमान: । एतेन वै बाल्यमभ्येति विद्वान् मृत्युंतथा स जयत्यन्तकाले,राजन! जो इस ब्रह्मचर्यका आश्रय लेता है, वह ब्रह्मबचारी यम-नियमादि तपका आचरण करता हुआ अपने सम्पूर्ण शरीरको भी पवित्र बना लेता है तथा इससे विद्वान् पुरुष निश्चय ही अबोध बालककी भाँति राग-द्वेषसे शून्य हो जाता है और अन्त समयमें वह मृत्युको भी जीत लेता है
ya āśrayet pāvayec cāpi rājan sarvaśarīraṃ tapasā tapyamānaḥ | etena vai bālyam abhyeti vidvān mṛtyuṃ tathā sa jayaty antakāle ||
राजन्! जो इस ब्रह्मचर्य का आश्रय लेता है, वह यम-नियमादि तप का आचरण करते हुए अपने सम्पूर्ण शरीर को भी पवित्र कर लेता है। इसी से विद्वान् पुरुष निश्चय ही अबोध बालक की भाँति राग-द्वेष से रहित हो जाता है, और अन्त समय में वह मृत्यु को भी जीत लेता है।
सनत्सुजात उवाच