Sanatsujāta–Dhṛtarāṣṭra Saṃvāda: Pramāda as Mṛtyu
Chapter 42
अ्हते याचमानाय प्रदेयं तच्छुभं भवेत् । अप्रमादी भवेदेतै: स चाप्यष्टगुणो भवेत्,सुयोग्य याचकके आ जानेपर उसे दान करे (यह छठा त्याग है)। इन सबसे कल्याण होता है। इन त्यागमय गुणोंसे मनुष्य अप्रमादी होता है। उस अप्रमादके भी आठ गुण माने गये हैं--सत्य, ध्यान, अध्यात्मविषयक विचार, समाधान, वैराग्य, चोरी न करना, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह
ahate yācamānāya pradeyaṃ tacchubhaṃ bhavet | apramādī bhaved etaiḥ sa cāpy aṣṭaguṇo bhavet ||
जो अहिंसा से याचना करे, ऐसे योग्य याचक को दान देना चाहिए—यह शुभ होता है। इन त्यागमय अनुशासनों से मनुष्य अप्रमादी होता है; और वह अप्रमाद भी आठ गुणों से युक्त कहा गया है।
सनत्युजात उवाच