Sanatsujāta–Dhṛtarāṣṭra Saṃvāda: Pramāda as Mṛtyu
Chapter 42
ध्तराष्ट्र वाच कल्मषं तपसो ब्रूहि श्रुतं निष्कल्मषं तप: । सनत्सुजात येनेदं विद्यां गुह्ूं सनातनम्
धृतराष्ट्र बोले—सनत्सुजातजी! मैंने निष्कल्मष तप का महत्त्व सुना। अब तप के जो दोष हैं, वे बताइए, जिससे मैं इस सनातन, गोपनीय विद्या को जान सकूँ।
सनत्युजात उवाच