Sanatsujāta-Āhvāna (Summoning Sanatsujāta) — Vidura’s Invocation and Dhṛtarāṣṭra’s Doubt
उभे सत्ये क्षत्रियैतस्य विद्धि मोहान्मृत्यु: सम्मतो5यं कवीनाम् । प्रमाद॑ वै मृत्युमहं ब्रवीमि तथाप्रमादममृतत्वं ब्रवीमि,क्षत्रिय! इस प्रश्नके उक्त दोनों ही पहलुओंको सत्य समझो। कुछ विद्वानोंने मोहवश इस मृत्युकी सत्ता स्वीकार की है; किंतु मेरा कहना तो यह है कि प्रमाद ही मृत्यु है और अप्रमाद ही अमृत है
ubhe satye kṣatriyaitasya viddhi mohān mṛtyuḥ sammato ’yaṃ kavīnām | pramādaṃ vai mṛtyum ahaṃ bravīmi tathāpramādam amṛtatvaṃ bravīmi, kṣatriya ||
हे क्षत्रिय! इस विषय के दोनों पक्ष सत्य समझो। कुछ कवि और मुनि मोहवश मृत्यु को एक वास्तविक और अंतिम सत्ता मान बैठे हैं; पर मेरा कथन यह है कि प्रमाद ही मृत्यु है और अप्रमाद ही अमृतत्व है।
सनत्युजात उवाच