Ārjava, Satya, and the Virocana–Sudhanvan Exemplum
Udyoga-parva 35
चलचित्तस्य वै पुंसो वृद्धाननुपसेवत: । पारिप्लवमतेर्नित्यमप्चुवो मित्रसंग्रह:,जिसका चित्त चंचल है, जो वृद्धोंकी सेवा नहीं करता, उस अनिश्चितमति पुरुषके लिये मित्रोंका संग्रह स्थायी नहीं होता
calacittasya vai puṁso vṛddhān anupasevataḥ | pāriplavamater nityam apy uvo mitrasaṅgrahaḥ ||
जिसका चित्त चंचल है, जो वृद्धों की सेवा-उपासना नहीं करता, उस अनिश्चित बुद्धि वाले पुरुष के लिए मित्रों का संग्रह कभी स्थिर नहीं रहता।
विदुर उवाच