Udyoga-parva Adhyāya 34 — Vidura’s Counsel on Deliberation, Speech-Discipline, and Dharmic Kingship
प्रज्ञामेवागमयति य: प्राज्ञेभ्य:ः स पण्डित: । प्राज्ञो हवाप्य धर्मार्थी शक््नोति सुखमेधितुम्
जो बुद्धिमानों से सद्बुद्धि प्राप्त करता है, वही पण्डित है; क्योंकि बुद्धिमान पुरुष धर्म और अर्थ को साधकर सहज ही सुखपूर्वक उन्नति कर सकता है।
विदुर उवाच