Udyoga-parva Adhyāya 34 — Vidura’s Counsel on Deliberation, Speech-Discipline, and Dharmic Kingship
युधन्वोवाच पितापुत्रौ सहासीतां द्वौ विप्रौ क्षत्रियावपि । वृद्धौ वैश्यौ च शूद्रौ च न त्वन्यावितरेतरम्,सुधन्वाने कहा--विरोचन! पिता और पुत्र एक साथ एक आसनपर बैठ सकते हैं; दो ब्राह्मण, दो क्षत्रिय, दो वृद्ध, दो वैश्य और दो शूद्र भी एक साथ बैठ सकते हैं; किंतु दूसरे कोई दो व्यक्ति परस्पर एक साथ नहीं बैठ सकते
sudhanvovāca—virocana! pitāputrau sahāsītāṃ dvau viprau kṣatriyāv api | vṛddhau vaiśyau ca śūdrau ca na tv anyāv itaretaram ||
सुधन्वा ने कहा—हे विरोचन! पिता-पुत्र एक साथ एक आसन पर बैठ सकते हैं। इसी प्रकार दो ब्राह्मण, दो क्षत्रिय, दो वृद्ध, दो वैश्य और दो शूद्र भी साथ बैठ सकते हैं; पर इनके अतिरिक्त अन्य कोई दो व्यक्ति परस्पर समान होकर एक साथ नहीं बैठ सकते।
विरोचन उवाच