उद्योगपर्व — अध्याय 33: धृतराष्ट्र-विदुर संवादः (विदुरनीतिः)
निजानुत्पतत: शत्रून्ू पजच पउठ्चप्रयोजनान् । यो मोहान्न निगृह्नाति तमापद् ग्रसते नरम्,जो पाँच विषयोंकी ओर दौड़नेवाले अपने पाँच इन्द्रियरूपी शत्रुओंको मोहके कारण वशमें नहीं करता, उस मनुष्यको विपत्ति ग्रस लेती है
nijān utpatataḥ śatrūn pañca pañca-prayojanān | yo mohān na nigṛhṇāti tam āpad grasate naram ||
जो मनुष्य पाँच विषयों की ओर दौड़ने वाले अपने पाँच इन्द्रियरूपी शत्रुओं को मोहवश वश में नहीं करता, उसे विपत्ति ग्रस लेती है।
विदुर उवाच