उद्योगपर्व — अध्याय 33: धृतराष्ट्र-विदुर संवादः (विदुरनीतिः)
समवेक्ष्येह धर्मार्थी सम्भारान् योडधिगच्छति । स वै सम्भूतसम्भार: सततं सुखमेधते,जो इस जगतमें धर्म तथा अर्थका विचार करके विजयसाधन-सामग्रीका संग्रह करता है, वही उस सामग्रीसे युक्त होनेके कारण सदा सुखपूर्वक समृद्धिशाली होता रहता है
samavekṣyeha dharmārthī sambhārān yo ’dhigacchati | sa vai sambhūta-sambhāraḥ satataṃ sukham edhate ||
जो इस लोक में धर्म और अर्थ को भलीभाँति परखकर विजय-साधन सामग्री का संग्रह करता है, वह सम्यक् साधनों से युक्त होकर निरन्तर सुख और समृद्धि पाता है।
विदुर उवाच