Adhyaya 32: Saṃjaya’s Return, Audience with Dhṛtarāṣṭra, and Ethical Admonition
विवेकपूर्ण बुद्धिवाले पुरुष शक्तिके अनुसार काम करनेकी इच्छा रखते हैं और करते भी हैं तथा किसी वस्तुको तुच्छ समझकर उसकी अवहेलना नहीं करते,क्षिप्रं विजानाति चिरं शुणोति विज्ञाय चार्थ भजते न कामात् । नासम्पृष्टो व्युपयुद्धक्ते परार्थे तत् प्रज्ञानं प्रथमं पण्डितस्य विद्वान् पुरुष किसी विषयको देरतक सुनता है; किंतु शीघ्र ही समझ लेता है, समझकर कर्तव्यबुद्धिसे पुरुषार्थमें प्रवृत्त होता है--कामनासे नहीं, बिना पूछे दूसरेके विषयमें व्यर्थ कोई बात नहीं कहता है। उसका यह स्वभाव पण्डितकी मुख्य पहचान है
kṣipraṃ vijānāti ciraṃ śṛṇoti vijñāya cārthaṃ bhajate na kāmāt | nāsampṛṣṭo vyupayuddhate parārthe tat prajñānaṃ prathamaṃ paṇḍitasya ||
पण्डित पुरुष किसी विषय को देर तक सुनता है, पर शीघ्र ही समझ लेता है। समझकर वह कामना से नहीं, कर्तव्यबुद्धि से हितकर पुरुषार्थ में प्रवृत्त होता है। और बिना पूछे वह पराये विषय में व्यर्थ वचन नहीं कहता—यही पण्डित की प्रथम पहचान है।
विदुर उवाच