Adhyaya 32: Saṃjaya’s Return, Audience with Dhṛtarāṣṭra, and Ethical Admonition
प्राप्पापदं न व्यथते कदाचि- दुद्योगमन्विच्छति चाप्रमत्त: । दुःखं च काले सहते महात्मा धुरन्धरस्तस्य जिता: सपत्ना:
जो धुरन्धर महात्मा आपत्ति आने पर कभी व्यथित नहीं होता, अप्रमत्त होकर उद्योग का आश्रय लेता है, और समय आने पर दुःख सह लेता है—उसके शत्रु तो जीते हुए ही हैं।
विदुर उवाच