Udyoga Parva, Adhyaya 31 — Yudhiṣṭhira’s Instructions to Sañjaya
Peace Appeal and Five-Village Proposal
जागर्ति चेदभिवदेस्त्वं हि द्वाःस्थ प्रविशेयं विदितो भूमिपस्य । निवेद्यमत्रात्ययिकं हि मे$स्ति द्वाःस्थो5थ श्रुत्वा नृपतिं जगाम,'द्वारपाल! यदि महाराज जागते हों तो तुम उन्हें मेरा प्रणाम कहना। उनकी सूचना मिल जानेपर मैं भीतर प्रवेश करूँगा। मुझे उनसे एक आवश्यक निवेदन करना है।' यह सुनकर द्वारपाल महाराजके पास गया और इस प्रकार बोला
jāgarti ced abhivades tvaṃ hi dvāḥstha praviśeyaṃ vidito bhūmipasya | nivedyam atrātyayikaṃ hi me 'sti dvāḥstho 'tha śrutvā nṛpatiṃ jagāma ||
द्वारपाल! यदि महाराज जाग रहे हों तो उन्हें मेरा प्रणाम कहना। भूमिपति को मेरी सूचना मिल जाने पर मैं भीतर प्रवेश करूँगा। मुझे उनसे एक अत्यावश्यक निवेदन करना है। यह सुनकर द्वारपाल नरेश के पास गया।
वैशम्पायन उवाच