अध्याय २९ — वासुदेव–संजय संवादः
Karma, Varṇa-Dharma, and the Ethics of Governance
ये जीवन्ति व्यवहारेण राष्टरे पशुूंश्ष ये पालयन्तो वसन्ति,(कृषीवला बिश्रति ये च लोकं तेषां सर्वेषां कुशल सम पृच्छे: ।) जो कौरव-राज्यमें व्यापारसे जीविका चलाते हैं, पशुओंका पालन करते हुए निवास करते हैं तथा जो खेती करके सब लोगोंका भरण-पोषण करते हैं, उन सब वैश्योंका भी कुशल-समाचार पूछना
yudhiṣṭhira uvāca | ye jīvanti vyavahāreṇa rāṣṭre paśūṃś ca ye pālayanto vasanti | kṛṣīvalā bibhrati ye ca lokaṃ teṣāṃ sarveṣāṃ kuśala-samāṃ pṛcche ||
जो कौरव-राज्य में व्यापार से जीविका चलाते हैं, जो पशुओं का पालन करते हुए रहते हैं, और जो खेती करके लोगों का भरण-पोषण करते हैं—उन सब वैश्यों का भी कुशल-समाचार पूछना।
युधिछिर उवाच