उद्योगपर्व — अध्याय २५: संजयदूतवाक्यम्
Sañjaya’s Envoy-Speech on Peace
तदैव मे संजय दीव्यतो< भू- न्मति: कुरूणामागत: स्यादभाव: । काव्यां वाचं विदुरो भाषमाणो न विन्दते यद् धार्तराष्ट्रात् प्रशंभाम्,संजय! जिस समय मैं जूआ खेल रहा था, उसी समयकी बात है, विदुरजी शुक्रनीतिके अनुसार युक्ति-युक्त वचन कह रहे थे, तो भी दुर्योधनकी ओरसे उन्हें प्रशंसा नहीं प्राप्त हुई। तभी मेरे मनमें यह विचार उत्पन्न हुआ था कि सम्भवत: कौरवोंका विनाशकाल समीप आ गया है
tadaiva me sañjaya dīvyato 'bhūn matiḥ kurūṇām āgataḥ syād abhāvaḥ | kāvyāṃ vācaṃ viduro bhāṣamāṇo na vindate yad dhārtarāṣṭrāt praśaṃbhām ||
संजय ने कहा—जब मैं द्यूत-क्रीड़ा में लगा था, तभी मेरे मन में यह विचार उठा कि कौरवों का विनाशकाल निकट आ गया है। क्योंकि विदुरजी राज्यनीति के अनुसार युक्तियुक्त हित-वचन कह रहे थे, फिर भी धृतराष्ट्र के पुत्र से उन्हें प्रशंसा न मिली। जहाँ उत्तम सलाह ठुकरा दी जाए और धर्म का स्वागत न हो, वहाँ विनाश दूर नहीं होता।
संजय उवाच