धृतराष्ट्र-संजय संवादः — उपप्लव्यगमनाज्ञा
Dhṛtarāṣṭra–Saṃjaya Dialogue: Command to Proceed to Upaplavya
उपश्ििताक्षेदिकरूषका श्र सर्वोद्योगैर्भूमिपाला: समेता: । तेषां मध्ये सूर्यमिवातपन्तं श्रिया वृतं चेदिपतिं ज्वलन्तम्,(युधिष्ठिरके राजसूययज्ञमें) चेदि और करूषदेशके भूपाल सब प्रकारकी तैयारीसे संगठित होकर आये थे। उन सबके बीचमें चेदिराज शिशुपाल अपनी दिव्य शोभासे तपते हुए सूर्यकी भाँति प्रकाशित हो रहा था। युद्धमें उसके वेगको रोकना असम्भव था। धनुषकी प्रत्यंचा खींचनेवाले भूमण्डलके सभी योद्धाओंमें शिशुपाल एक श्रेष्ठतम वीर था। यह सब समझकर भगवान् श्रीकृष्णने वहाँ चेदिदेशीय क्षत्रियोंके सम्पूर्ण उत्साहको नष्ट करके हठपूर्वक बड़े वेगसे शिशुपालको मार डाला पुरा जेतुं नकुल: प्रेषितो<5यं शिबींस्त्रिगर्तान् संजय पश्यतस्ते | दिशं प्रतीचीं वशमानयन्मे माद्रीसुतं कच्चिदेनं स्मरन्ति संजय! पहले राजसूययज्ञमें तुम्हारे सामने ही शिबि और त्रिगर्तदेशके वीरोंको जीतनेके लिये इस नकुलको भेजा गया था; परंतु इसने सारी पश्चिम दिशाको जीतकर मेरे अधीन कर दिया। क्या कौरव इस वीर माद्रीकुमारका भी स्मरण करते हैं?
Vaiśampāyana uvāca: upaśritāś Cedi-Karūṣakāś ca sarvodyogair bhūmipālāḥ sametāḥ | teṣāṁ madhye sūryam ivātapantaṁ śriyā vṛtaṁ Cedi-patiṁ jvalantam ||
वैशम्पायन बोले— चेदि और करूष के भूपाल सब प्रकार की तैयारी के साथ वहाँ एकत्र हुए थे। उन सबके बीच चेदिराज शिशुपाल अपनी शोभा से तपते सूर्य की भाँति दैदीप्यमान था। संजय! पहले (राजसूय में) तुम्हारे देखते-देखते शिबि और त्रिगर्तों को जीतने के लिए इसी नकुल को भेजा गया था; पर उसने समूची पश्चिम दिशा को जीतकर मेरे अधीन कर दिया। क्या कौरव इस माद्रीकुमार को भी याद करते हैं?
वैशम्पायन उवाच
The verse highlights how collective political and military energy can concentrate around a single radiant ruler; such splendor (śrī) inspires awe and cohesion, yet it also hints at the moral risks of power—how brilliance and readiness for conflict can intensify rivalry and pride.
Vaiśampāyana describes an assembly of kings from Cedi and Karūṣa who arrive fully prepared. Among them, the king of Cedi stands out, shining intensely like the sun, emphasizing his prominence and the charged atmosphere of royal gathering.