Adhyāya 195 — Arjuna’s Capability and Restraint Regarding Divyāstras
Udyoga Parva
भाण्डं समारोपयतां चरतां सम्प्रधावताम् । हृष्टानां तत्र योधानां शब्दो दिवमिवास्पृशत्
वहाँ हर्ष से भरे योद्धाओं में कोई सवारियों पर युद्ध-सामग्री चढ़ा रहा था, कोई इधर-उधर चल रहा था और कोई कार्यवश दौड़-धूप कर रहा था। उनका कोलाहल मानो स्वर्गलोक को छूने लगा।
वैशम्पायन उवाच