Drupada’s Alarm and Inquiry Regarding Śikhaṇḍinī (द्रुपदस्य भय-विमर्शः)
यदुक्त तेन वीरेण राज्ञा काउ्चनवर्मणा । यत् तेडहमधमाचार दुह्ित्रास्म्यभिवज्चित:,उद्धरिष्यामि ते सद्यः: सामात्यसुतबान्धवम् | “राजन! वीरवर राजा हिरण्यवर्माने जो संदेश दिया है, उसे सुनिये। पापाचारी दुर्बृद्धि नरेश! तुम्हारी पुत्रीके द्वारा मैं ठगा गया हूँ। वह पाप तुमने ही किया है; अतः उसका फल भोगो। नरेश्वर! युद्धके मैदानमें आकर मुझे युद्धका अवसर दो। मैं मन्त्री, पुत्र और बान्धवोंसहित तुम्हारे समस्त कुलको उखाड़ फेंकूँगा'
yad uktaṃ tena vīreṇa rājñā kāñcanavarmaṇā | yat te 'ham adhamācāra duhitrasmy abhivañcitaḥ, uddhariṣyāmi te sadyaḥ sāmātya-suta-bāndhavam ||
उस वीर राजा काञ्चनवर्मा ने जो कहा था—“राजन्! अधम आचरण वाले! तुम्हारी पुत्री के कारण मैं ठगा गया हूँ। उस पाप का कर्ता तुम ही हो; इसलिए उसका फल भोगो। नरपते! मुझे युद्ध दो; आज रणभूमि के अग्रभाग में। मैं आज ही मन्त्रियों, पुत्रों और बान्धवों सहित तुम्हारे कुल को उखाड़ फेंकूँगा।”
भीष्म उवाच