अम्बाया रामजामदग्न्यशरणगमनम्
Ambā Seeks Refuge with Rāma Jāmadagnya
किमियं वक्ष्यतीत्येवं विममर्श भगूद्वह: । इति दध्यौ चिरं राम: कृपयाभिपरिप्लुत:,भीष्मजी कहते हैं--राजन्! उसके सुन्दर रूप, नूतन (तरुण) शरीर तथा अत्यन्त सुकुमारताको देखकर परशुरामजी चिन्तामें पड़ गये कि न जाने यह क्या कहेगी? उसके प्रति दयाभावसे परिपूर्ण हो भूगुकुलभूषण परशुराम बहुत देरतक उसीके विषयमें चिन्ता करते रहे
kim iyaṁ vakṣyatīty evaṁ vimamarśa bhagūd-vahaḥ | iti dadhyau ciraṁ rāmaḥ kṛpayābhipariplutaḥ ||
भीष्म बोले—राजन्! ‘यह क्या कहेगी?’ ऐसा विचार कर भृगुकुल-श्रेष्ठ राम (परशुराम) करुणा से भरकर बहुत देर तक मनन करते रहे।
भीष्म उवाच