Ulūka’s Provocation and Keśava’s Counter-Message (उलूकदूत्ये केशवप्रत्युत्तरम्)
अस्य गात्राणि वर्धन्ते गणश्ष परिहीयते । अद्य सप्ताष्टदिवसान् डिण्डिको5पि न दृश्यते,“उसके अंग दिनोंदिन हृष्ट-पुष्ट होते जाते हैं और हमारा यह दल रोज-रोज घटता जा रहा है। आज सात-आठ दिनोंसे डिंडिकका भी दर्शन नहीं हो रहा है”
asya gātrāṇi vardhante gaṇaś ca parihīyate | adya saptāṣṭa-divasān ḍiṇḍiko 'pi na dṛśyate ||
संजय ने कहा— “इसके अंग दिन-प्रतिदिन हृष्ट-पुष्ट होते जा रहे हैं और हमारा दल घटता ही जा रहा है। और आज सात-आठ दिनों से डिंडिक का भी दर्शन नहीं हुआ।”
संजय उवाच