Ulūka’s Provocation and Keśava’s Counter-Message (उलूकदूत्ये केशवप्रत्युत्तरम्)
यस्य धर्मध्वजो नित्यं सुरा ध्वज इवोच्छित: । प्रच्छन्नानि च पापानि बैडालं नाम तद् व्रतम्
जिसकी धर्मध्वजा सदा देवध्वज के समान ऊँची फहराती रहे, पर जिसके पाप गुप्त रूप से चलते रहें—उस व्रत को ‘बिडाल-व्रत’ कहते हैं।
संजय उवाच