Rukmī’s Offer of Aid and Arjuna’s Refusal (रुक्मिप्रस्तावः—अर्जुनप्रत्याख्यानम्)
एवमेषां करिष्यामि निधनं कुरुनन्दन । न चेत् ते मां हनिष्यन्ति पूर्वमेव समागमे,परंतु जनेश्वर! मैं पाण्डुके पुत्रोंकी किसी तरह हत्या नहीं करूँगा। कुरुनन्दन! यदि पाण्डव इस युद्धमें मुझे पहले ही नहीं मार डालेंगे तो मैं अपने अस्त्रोंके प्रयोगद्वारा प्रतिदिन उनके पक्षके दस हजार योद्धाओंका वध करता रहूँगा, मैं इस प्रकार इनकी सेनाका संहार करूँगा
evam eṣāṁ kariṣyāmi nidhanaṁ kurunandana | na cet te māṁ haniṣyanti pūrvam eva samāgame ||
कुरुनन्दन! मैं इसी प्रकार उनकी सेना का विनाश करूँगा। यदि वे इस संग्राम में पहले ही मुझे न मार गिराएँ, तो मैं अपने अस्त्रों के प्रयोग से प्रतिदिन उनके पक्ष के दस हजार योद्धाओं का वध करता रहूँगा।
भीष्म उवाच