धृतराष्ट्रस्य वंशोपदेशः
Dhṛtarāṣṭra’s Dynastic Counsel on Legitimate Rule
अनुज्ञया चाथ महाव्रतस्य ब्रूयान्नपो5यं विदुरस्तथैव । कार्य भवेत् तत् सुहृद्धिर्नियोज्यं धर्म पुरस्कृत्य सुदीर्घकालम्,“अथवा इन महान् व्रतधारी भीष्मजीकी आज्ञासे यह राजा धृतराष्ट्र तथा विदुर भी इस विषयमें कुछ कह सकते हैं और अन्य सुहृदोंको भी धर्मको सामने रखते हुए उसीका सुदीर्घ कालतक पालन करना चाहिये
anujñayā cātha mahāvratasya brūyān nāpo 'yaṃ viduras tathaiva | kāryaṃ bhavet tat suhṛdbhir niyojyaṃ dharmaṃ puraskṛtya sudīrghakālam ||
और उस महान् व्रतधारी की आज्ञा से यह विदुर भी निःसंकोच वही बात कहे। जो करना उचित हो, वह सुहृदों से परामर्श करके, धर्म को अग्र में रखकर, दीर्घकाल तक दृढ़तापूर्वक किया जाना चाहिए।
विदुर उवाच