कुन्ती–कर्णसंवादः
Kuntī–Karṇa Dialogue: Loyalty, Fate, and Constrained Assurance
उपपन्नो गुणै: सर्वर्ज्येष्ठ: श्रेष्ठेषु बन्धुषु । सूतपुत्रेति मा शब्द: पार्थस्त्वमसि वीर्यवान्
श्रेष्ठ स्वभाव वाले बन्धुओं के बीच तुम सर्वगुणसम्पन्न ज्येष्ठ भ्राता हो; तुम पराक्रमी पार्थ (कुन्तीपुत्र) हो—तुम्हारे लिए ‘सूतपुत्र’ शब्द का प्रयोग नहीं होना चाहिए।
कर्ण उवाच