उद्योगपर्व — अध्याय १४० (कृष्णेन कर्णं प्रति पाण्डवबल-वैशिष्ट्यप्रदर्शनम्) / Udyoga Parva, Chapter 140
Krishna’s appraisal of Pandava advantage and war portents
तस्या: पिण्डव्यपनयं कुर्यादस्मद्विध: कथम् | धर्मविद् धर्मशास्त्राणां श्रवणे सततं रत:,अतः सदा धर्मशास्त्रोंके श्रवणमें तत्पर रहनेवाला मुझ-जैसा धर्मज्ञ पुरुष राधाके मुखका ग्रास कैसे छीन सकता है? (उसका पालन-पोषण न करके उसे त्याग देनेकी क्रूरता कैसे कर सकता है?)
धर्मशास्त्रों के श्रवण में सदा तत्पर रहने वाला मुझ-जैसा धर्मज्ञ पुरुष राधा के मुख का ग्रास कैसे छीन सकता है? (अर्थात् उसका पालन-पोषण न करके उसे त्याग देने की क्रूरता मैं कैसे कर सकता हूँ?)
कर्ण उवाच