Kṛṣṇasya Karṇam Prati Sāntvavacana
Kṛṣṇa’s Conciliatory Address to Karṇa
मिथ्योपचरिता होते वर्तमाना हानु प्रिये | अहितत्वाय कल्पन्ते दोषा भरतसत्तम
भरतश्रेष्ठ! तुमने पाण्डवों के साथ सदा मिथ्या व्यवहार—छल-कपट—ही किया है, तो भी वे सदा तुम्हारा प्रिय करने में ही लगे रहे हैं। इसलिए ईर्ष्या-द्वेष आदि तुम्हारे ये दोष अंततः तुम्हारे ही अहित का कारण बनेंगे।
भीष्म उवाच