Kṛṣṇasya Karṇam Prati Sāntvavacana
Kṛṣṇa’s Conciliatory Address to Karṇa
द्रोण उदाच अश्वत्थाम्नि यथा पुत्रे भूयो मम धनंजये । बहुमान: परो राजन् संनतिश्व कपिध्वजे,द्रोणाचार्यने कहा--राजन! मेरा अपने पुत्र अश्वत्थामाके प्रति जैसा आदर है, उससे भी अधिक अर्जुनके प्रति है। कपिध्वज अर्जुनमें मेरे प्रति बहुत विनयभाव है
Droṇa uvāca—Aśvatthāmni yathā putre bhūyo mama Dhanañjaye; bahumānaḥ paro rājan, sannatiś ca Kapidhvaje.
द्रोणाचार्य बोले—राजन्! जैसे मेरा स्नेह अपने पुत्र अश्वत्थामा में है, उससे भी अधिक धनंजय अर्जुन में है। कपिध्वज अर्जुन में मेरे प्रति अत्यन्त विनय और आदर है।
भीष्म उवाच