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Shloka 2

Vidurā–Putra Saṃvāda: Utsāha, Kīrti, and Kṣātra Resolve

Udyoga-parva 131

वायुदेव उवाच उक्त बहुविध॑ वाक्‍्यं ग्रहणीयं सहेतुकम्‌ । ऋषिभिश्चैव च मया न चासौ तद्‌ गृहीतवान्‌

वायुदेव बोले—बुआजी! मैंने तथा महर्षियों ने भी सभा में नाना प्रकार के युक्तियुक्त वचन कहे, जो सर्वथा ग्रहण करने योग्य थे; परन्तु दुर्योधन ने उन्हें नहीं माना।

वायुदेव उवाच