Udyoga-parva Adhyāya 130: Kuntī’s Instruction on Rājadharma and Daṇḍanīti
भगवन् मम नेत्राणामन्तर्धानं वृणे पुनः । भवन्तं द्रष्टमिच्छामि नान्यं॑ द्रष्टमिहोत्सहे
भगवन्! मेरे नेत्रों का तिरोधान हो चुका है; आज मैं आपसे पुनः नेत्र माँगता हूँ। मैं केवल आपका दर्शन करना चाहता हूँ; आपके सिवा किसी और को यहाँ देखने का साहस नहीं करता।
धृतराष्ट उवाच